وقال (عليه السلام): إِذَا أَقْبَلَتِ الدُّنْيَا عَلَى أحَد أَعَارَتْهُ مَحَاسِنَ غَيْرِهِ، وَإِذَا أَدْبَرَتْ عَنْهُ سَلَبَتْهُ مَحَاسِنَ نَفْسِهِ .                
وقال (عليه السلام): إِذَا قَدَرْتَ عَلَى عَدُوِّكَ فَاجْعَلِ الْعَفْوَ عَنْهُ شُكْراً لِلْقُدْرَةِ عَلَيْهِ .                
وقال (عليه السلام): الغِنَى والْفَقْرُ بَعْدَ الْعَرْضِ عَلَى اللهِ.                
وقال (عليه السلام): أَشَدُّ الذُّنُوبِ مَا اسْتَخَفَّ بِهِ صَاحِبُهُ.                
وقال (عليه السلام) : هَلَكَ فِي رَجُلاَنِ: مُحِبٌّ غَال ، وَمُبْغِضٌ قَال .                
وقال (عليه السلام): رُبَّ مَفْتُون بِحُسْنِ الْقَوْلِ فِيهِ.                
وقال (عليه السلام): إِذَا قَدَرْتَ عَلَى عَدُوِّكَ فَاجْعَلِ الْعَفْوَ عَنْهُ شُكْراً لِلْقُدْرَةِ عَلَيْهِ .                

Search form

إرسال الی صدیق
مع الشريف الرضي في ديوانه – الثامن

قال  الشريف  مادحاً :

قام  يجني  العلا  وأنتم  قعود *** وصحا  للندى  وأنتم  سكارى

أخذه  سبط  بن  التعاويذي  ولم  يحسن  أخذه :

إذا  تيقّظت  للعلا  رقدوا  عنها *** وإن   قمت   بالندى   قعدوا

قال  الشريف :

أفي  كلِّ  يوم  أنت  ماتح  عبرة *** على  طلل  بالواد  أو  منزل  قفر

وقال  عبد  المحسن  الكاظمي  في  عينيّته  الشهيرة  وقد  أخذ  الشطر  الأوّل برمّته  :

أفي  كلِّ  دار  أنت  ماتح  عبرة *** إذا  غاض  منها  مدمع  فاض  مدمع

قال  الشريف  :

في  صيال  الأسود  إن  نزل  الخطـ *** ــب  عليهم  وفي  حياء  العذارى

أخذه  سبط  بن  التعاويذي  فقال  :

من  ليوث  الشرى  إذا  دارت  الـ *** ـحرب  وفي  السلم  من  ظباء  الخدور

قال  الشريف  :

الماء  في  ناظري  والنار  في  كبدي *** إن  شئت  فاغترفي  أو  شئت  فاقتبسي

أخذه  العلاّمة  محمّد  الحسين  كاشف  الغطاء  :

خذوا  الماء  عن  عينىّ  والنار  عن  قلبي *** ولا  تحملوا  للبرق  منّا  ولا  السحب

قال  الشريف  مادحاً :

كأنَّ  ملوك  الأرض  حول  سريره *** بغاثٌ  وقوفٌ  والقطاميُّ  جالس( )

أخذه  الشيخ  محمّد  السماوي  في  مدح  سيّدي  الوالد(رحمه الله)  من  أبيات  :

ترى  الأنام  سكوتاً  عند  منطقه *** كأنَّه  مضرحىّ  والورى  رخم( )

قال  الشريف  مخاطباً  بهاء  الدولة  :

لا  تعطش  الزهر  الذي  نبته *** بصوب  انعامك  قد  روّضا

وأرع  لغرس  أنت  أنهضته *** لولاك  ما  قارب  أن  ينهضا

نظر  إليهما  سبط  بن  التعاويذي  فقال  يخاطب  عضد  الدين  بن  المظفّر  :

وسَقّ  غروس  المكرمات  فإنّني *** أعيذك  أن  تذوي  وأنت  لها  ربُّ

وحاشى  لمدحي  أن  تجفّ  غصونه *** ومن  بحر  جدواك  المعين  لها  شرب

قال  الشريف  في  الرثاء  :

أرسى  النسيم  بواديكم  ولا  برحت *** حوامل  المزن  في  أجداثكم  تضع

ولا  يزال  جنين  النبت  ترضعه *** على  قبوركم  العرّاصة  اللمع

وقد  سرقه  ابن  سعد  الموصلي  سرقة  فاحشة  فقال  من  قصيدة  يتشوّق فيها  إلى  دمشق  مطلعها  :

سقى  دمشق  وأياماً  مضت  فيها *** مواطر  المزن  ساريها  وغاديها

ولا  يزال  جنين  النبت  ترضعه *** حوامل  المزن  في  أحشاء  أرضيها

قال  الشريف  في  رثاء  أبي  حسّان  أمير  عقيل  :

لقد  صغَّر  الأرزاء  رزؤك  عندها *** وهوَّن  عندي  النازل  المتوقعا

أخذه  ابن  الأعسم  النجفي  في  رثاء  أهل  البيت(عليه السلام)  :

أنست  رزيّتكم  رزايانا  التي *** سلفت  وهوَّنت  الرزايا  الآتية

قال  الشريف  :

تمضي  العلا  وإلى  ذراكم  ترجع *** شمس  تغيب  لكم  وأخرى  تطلع

نظر  إليه  الأخرس  البغدادي  فقال  في  آل  النقيب  :

ما  غاب  بدر  دجىً  منكم  ولا  غربا *** إلاّ  وأشرق  بدر  كان  محتجبا

قال  الشريف  :

هيهات  لا  تتكلّفنّ  لي  الهوى *** فضح  التطبّع  شيمة  المطبوع

أخذه  السيّد  علي  خان  في  قوله  من  قصيدة  أثبتها  في  سلافته  في ترجمة  الخطّي  :

أتجشم  السلوان  عنه  تكلُّفاً *** والطبع  يغلب  شيمة  المتطبِّع

كما  أخذه  شاعر  العرب  عبد  المحسن  الكاظمي  في  عينيّته  الشهيرة  :

تعسّفتم  ما  كان  منّي  شيمة *** وأين  من  المطبوع  من  يتطبّع

قال  الشريف  :

إذا  راق  صبح  فالحصان  مصاحب *** وإن  جنَّ  ليل  فالحسام  ضجيع

أخذه  السيّد  حيدر  الحلّي  في  رثاء  الإمام  الحسين(عليه السلام)  :

وله  الطرف  حيث  سار  أنيس *** وله  السيف  حيث  بات  ضجيع

قال  الشريف  :

كأنَّني  يوم  استعطي  نوالكم *** دان  من  الصخرة  الصمّاء  يغترف

أخذه  السيّد  حيدر  فقال  :

وفي  الناس  من  يغدو  به  مستميحه *** كمستقطر  ماء  من  الحجر  الصلد

قال  الشريف  :

وقيذين  قد  مال  النعاس  بهامهم *** كما  أرعشت  أيدي  المعاطين  قرقف( )

وقد  أخذه  الحاج  حسن  القيِّم  الحلّي  :

ميل  على  الأكوار  تحسـ *** ـبهم  تعاطوا  كأس  قرقف

قال  السيّد  الشريف  :

من  منصفي  من  الملول  المذاق *** إنّ  مودّات  القلوب  أرزاق

نظر  إليه  السيّد  حسين  الطباطبائي  المتوفّى  عام  (١٣٠٦هـ)  فقال  :

بودِّه  خصَّني  الله  الودود  بلى *** ما  الودُّ  بين  الورى  إلاّ  بأرزاق

قال  الشريف  :

مالوا  إليك  محبّة  فتجمّعوا *** ورأوا  عليك  مهابة  فتفرَّقوا

نظر  إليه  مهيار  بقوله  :

إذا  جلسوا  تجمّعت  المعالي *** وإن  ركبوا  تفرّقت  الجموع

قال  الشريف  :

إلاّ  الخلافة  ميّزتك  لأنّني *** أنا  عاطل  منها  وأنت  مطوّق

أخذه  منه  أبو  البدر  المظفّر  بن  محمّد  بن  معروف  كاتب  عميد  الملك من  شعراء  الدمية  (ص١١٨)  :

لا  غرو  أن  أعرى  وغيـ *** ري  في  ثياب  الوشي  رافل

إن  الحمائم  ذات  أطوا *** ق  وجيد  الباز  عاطل

قال  الشريف  :

يا  ظبية  البان  ترعى  في  خمائله *** ليهنك  اليوم  إنّ  القلب  مرعاك( )

الماء  عندك  مبذول  لشاربه *** وليس  يرويك  إلاّ  مدمع  الباكي

وقد  ألمّ  بمعناهما  السيّد  الشريف  الحبوبي  في  قصيدة  راسل  بها  الحاج محمّد  حسن  كبّة  :

يا  ريم  حسبك  مهجتي  مرعى *** لا  شيح  كاظمة  ولا  الجرعا

وكفاك  عن  ورد  تلمُّ  به *** عين  تفيض  غروبها  دفعا

قال  الشريف  :

سهم  أصاب  وراميه  بذي  سلم *** من  في  العراق  لقد  أبعدت  مرماك

وقال  مهيار  :

ورام  سهم  عينيه  بسلع *** وبالزوراء  يقتل  من  يريد

قال  السيّد  الشريف  :

هامت  بك  العين  لم  تتبع  سواك  هوى *** من  أعلم  العين  أنَّ  القلب  يهواك

وعدٌ  لعينيك  عندي  ما  وفيت  به *** ياقرب  ما  كذبت  عينىَّ  عيناك

وقد  تداول  المعنى  كثير  من  الشعراء  فقال  أحدهم  :

وألسننا  ممنوعة  عن  مرادنا *** وألحاظنا  عنا  تجيب  وتفهمُ

حواجبنا  تقضي  الحوائج  بيننا *** ونحن  سكوت  والهوى  يتكلّم

ونظر  إليه  شاعر  العراق  المعاصر  الشيخ  محمّد  رضا  الشبيبي  فقال  :

تفاهمتا  عيني  وعينك  لحظة *** وأدركتا  أنّ  القلوب  شواهدُ

ثمّ  جاء  شاعر  مصر  أحمد  شوقي  فقال  :

وتعطَّلت  لغة  الكلام  فخاطبت *** عينىَّ  في  لغة  الهوى  عيناك

قال  الشريف  :

إلى  البلد  الحرام  معرّضات *** لإجراء  الطلى  بدم  حلال

أخذ  المعنى  السيّد  إبراهيم  الطباطبائي  فقال  :

أقول  لها  اسفحي  بدم  حلال *** ضحى  يا  نوق  بالبلد  الحرام

قال  الشريف  يصف  الناقة  ووخدها  في  السير  :

كتبت  سطوراً  في  مناسمها *** فوق  الأباطح  والسُرى  يُملي

نظر  إليه  (صرَّدر)  فقال  في  الطلول  :

وقفنا  صفوفاً  في  الديار  كأنّها *** صحائف  ملقاة  ونحن  سطورها

وقال  الشريف  :

وموت  الفتى  خير  له  من  حياته *** إذا  جاور  الأيّام  وهو  ذليل

أخذه  أبو  المحاسن  الحاج  محمّد  حسن  الحائري  الكربلائي  فقال  :

إذا  ألف  الدنىُّ  حياة  ذلّ *** فموت  العزِّ  أولى  بالغيور

وقال  الشريف  في  رثاء  الصاحب  بن  عبّاد  :

مفتاح  كلِّ  ندى  وربَّ  معاشر *** كانوا  على  أموالهم  أقفالا

أخذه  من  الشعراء  المتأخّرين  الحاج  حسن  القيّم  الحلّي  من  قصيدة  :

يا  فاتحاً  باب  الندى *** إن  أغلق  الكرماء  بابه

وقال  الشريف  في  الطائع  :

وأعطيت  ما  لم  يُعط  في  الملك  مالك *** كأنّك  فضل  والأنام  فضول

نظر  إليه  السيّد  حيدر  الحلّي  :

وقل  لعوادي  الحتف  شأنك  والورى *** مضى  الفضل  والباقون  منها  فضولها

وقال  الشريف  في  رثاء  الصاحب  :

وأقم  على  يأس  فقد  ذهب  الذي *** كان  الأنام  على  يديه  عيالا

أخذه  السيّد  حسين  بن  السيّد  سليمان  الحلّي  المتوفّى  عام  (١٢٣٦هـ) المترجم  في  الـ  (ج٢)  من  كتابنا  البابليّات  في  رثاء  الشيخ  جعفر  كاشف  الغطاء المتوفّى  عام  (١٢٢٨هـ)  :

لقد  ذهب  الذي  كانت  لديه *** جميع  الناس  عاكفة  عيالا

هلاّ  أقالتك  الليالي  عثرة *** يا  من  إذا  عثر  الزمان  أقالا

وقد  أخذه  السيّد  حسين  المذكور  أيضاً  فقال  :

عثرت  ولم  يقلك  الدهر  يا  من *** إذا  عثر  الزمان  له  أقالا

وقال  الشريف  في  قصيدته  :

ما  كنت  أوّل  كوكب  ترك  الدنى *** وسما  إلى  نظرائه  فتعالى

أخذه  السيّد  حسين  أيضاً  فقال  :

سما  للعالم  العلوىِّ  لمّا *** رأى  نظراءه  فيه  تعالى

وقد  أخذه  قبله  من  الشريف  سبط  بن  التعاويذي  في  رثاء  جدّه  لأمّه  :

ما  غاب  في  الترب  ولكن  كوكب *** رقى  إلى  جوِّ  السماء  وصعد

قال  الشريف  في  إحدى  غراميّاته  :

أنل  نائلاً  أولا  تثنِّ  بنظرة *** فإنّي  بالأولى  الغداة  قتيلُ

أخذه  السيّد  جعفر  الحلّي  ولم  يحسن  أخذه  فقال  :

يا  قاتلي  باللحظ  أوّل  مرّة *** أجهز  بثانية  على  المقتول

قال  الشريف  في  الصاحب  :

هيهات  فاتهم  تراث  مخاطر *** حفظ  الثناء  وضيَّع  الأموالا

أخذ  المعنى  السيّد  مهدي  بن  داود  الحلّي  فقال  في  آل  كبّة  :

حرصت  على  حفظ  الثناء  وضيّعت *** ما  بين  طلاّب  الندى  أموالها

قال  الشريف  :

يعجبني  مطل  ديون  الهوى *** لطول  تردادي  على  الماطل

نظر  إليه  تلميذه  مهيار  فقال  :

يا  ماطلي  بالدين  ما  ساءني *** إليك  ترديد  المواعيد  لي

قال  الشريف  في  مطلع  إحدى  حسينيّاته  :

راحل  أنت  والليالي  نزول *** ومضرٌّ  بك  البقاء  الطويل

أخذه  الشاعر  الشهير  جميل  صدقي  الزهاوي  فقال  :

ساكن  أنت  والأعادي  تقول *** ومضرٌّ  بك  السكوت  الطويل

قال  الشريف  :

غاية  الناس  في  الزمان  فناء *** وكذا  غاية  الغصون  الذبول

وقال  الشيخ  عبد  الحسين  صادق  العاملي  في  رثاء  عليّ  بن  الحسين شهيد  الطفّ  :

بكر  الذبول  على  نضارة  غصنه *** إنّ  الذبول  لآفة  الغصن  الندي

قال  الشريف  في  مدح  الطائع  :

فاتني  منك  انتصار  بيميـ *** ـني  فتلافيت  انتصاراً  بمقالي

أخذه  مهيار  الديلمي  فقال  في  أهل  البيت (عليهم السلام)  :

فما  فاتني  نصركم  باللسا *** ن  إذا  فاتني  نصركم  باليد

وقد  أخذه  أيضاً  عبد  المحسن  الكاظمي  من  قصيدة  في  الحرب الطرابلسية  الإيطالية  فقال  :

إن  فاتني  نصر  فرسان  الوغى  بيدي *** فكم  أفاد  لسان  في  الوغى  وفمُ

قال  الشريف  متحمّساً  :

يستشعر  الطرف  زهواً  حين  أركبه *** كأنّه  بنجوم  الليل  منتعل

أخذه  سبط  بن  التعاويذي  يصف  فرس  الخليفة  :

مفتخراً  بنعله *** على  هلال  الأفقِ

قال  الشريف  :

طلبوا  التراث  فلم  يروا  من  بعده *** إلاّ  علاً  وفضائلاً  وجلالا

وهو  عين  ما  قاله  في  رثاء  والده  :

هل  يورث  الرجل  الكريم  إذا  مضى *** إلاّ  بواقي  من  علاً  وتكرُّمِ

أخذه  السيّد  حيدر  الحلّي  فقال  :

مناجيب  قد  أفنى  التراث  على  الندى *** أبوهم  وأبقى  في  العلا  لهم  الذكرى

قال  الشريف  :

وتُرى  خفافاً  في  الوغى  فإذا  انتدوا *** وتلاغط  النادي  رأيت  ثقالا

أخذه  السيّد  حيدر  فقال  :

إن  دُعوا  خفّوا  إلى  داعي  الوغى *** وإذا  النادي  احتبى  كانوا  الثقالا

قال  الشريف  في  كرائم  النبوّة  يوم  كربلاء  :

قد  سلبن  القناع  عن  كلِّ  وجه *** فيه  للصون  من  قناع  بديل

أخذه  الحاج  هاشم  الكعبي  بقوله  :

بدت  وهي  حسرى  الوجه  ممّا  يروعها *** وكم  حاسر  في  صونه  يتنقّب

قال  الشريف  :

وبات  بارق  ذاك  الثغر  يوضح  لي *** مواقع  اللثم  في  داج  من  الظلم

نظر  إليه  إبراهيم  الغزّي  المتوفّى  عام  (٥٢٤هـ)  فقال  من  قصيدة  :

حتّى  إذا  طاح  منها  المرط  من  دهش *** وأنحلَّ  بالضم ّ سلك العقد في الظلم

تبسّمت  فأضاء  الليل  فالتقطت *** حبّات  منتثر  في  ضوء  منتظم

ونظر  إليه  مهيار  قبله  فقال  :

وقد  كاد  أسداف  الدجى  أن  يضلّها *** فما  دلّها  إلاّ  وميض  ثناياها

وقال  الشريف  في  رثاء  ابن  ليلى  :

لعمرو  الطير  يوم  ثوى  ابن  ليلى *** لقد  عكفت  على  لحم  كريم

أخذه  السيّد  حيدر  الحلّي  في  رثاء  جدِّه  الحسين(عليه السلام)  إلاّ  أنّه  جعل السيوف  مكان  الطير  وقد  أجاد  بقوله  :

وإن  أكلت  هندية  البيض  شلوه *** فلحم  كريم  القوم  طعم  المهنّدِ

قال  الشريف  :

بن  على  الناس  بعزٍّ  وعلاً *** ستساويهم  غداً  بين  الرمم

أخذ  المعنى  مهيار  الديلمي  بقوله  :

ميّز  من  الناس  على  ظهرها *** نفسك  لا  ميزة  بين  الرغام

قال  الشريف  :

ماض  من  العيش  لو  يفدى  فديت  له *** كرائم  المال  من  خيل  ومن  نَعَمِ

أخذه  القاضي  الأرجاني  ولم  يوفّق  في  أخذه  :

لو  كان  يفدى  فيُرى  راجعاً *** ماض  من  العيش  فديناه

قال  الشريف  :

ولم  أر  مثل  الماطلات  عشية *** ذوات  يسار  ما  قضين  غريما

أخذ  مهيار  معنى  الشطر  الثاني  منه  وأودعه  الشطر  الأوّل  من  قوله  :

يالواة  الدين  عن  ميسرة *** والضنينات  وماكنَّ  لئاما

قال  الشريف  في  وصف  الإبل  التي  أنحلها  السير  :

هنَّ  القسىُّ  من  النحول  فإن  سما *** طلب  فهنَّ  من  النجاء  الأسهم

أخذه  ابن  قلاقس  بأكثر  ألفاظه  فقال  :

خوص  كأمثال  القسىِّ  نواحلاً *** فإذا  سما  طلب  فهنَّ  سهام

وأخذه  من  المتأخّرين  السيّد  جعفر  الحلّي  بقوله  :

متعطّفات  كالقسىِّ  موائلاً *** وإذا  ارتمت  فكأنّما  هي  أسهم

قال  الشريف  :

فلا  باسط  بالسوء  إن  ساءني  يداً *** ولا  فاغر  بالذمِّ  إن  رابني  فما

وقال  مهيار  :

ولا  تحسبنِّي  باسطاً  يد  دافع *** ولا  فاتحاً  من  بعدها  فم  عاتب

قال  الشريف  :

ولولاك  ما  استسقيت  مزناً  لمنزل *** فأحمل  فيه  منّة  للغمائم

وقد  أحسن  أخذه  ابن  الخيّاط  الدمشقي  وزاد  معناه  حسناً  على  الأصل  :

وما  كنت  لولا  أنَّ  دمعي  من  دم *** لأحمل  منّا  للسحاب  بسقياه

قال  الشريف  من  قصيدة  في  مدح  والده  :

وفتية  علّموا  القنا  كرماً *** فأصبحت  من  ضيوفها  الرخم

أخذه  الحاج  حسن  القيّم  الحلّي  في  رثاء  الحسين(عليه السلام)  :

أعدت  السيف  كفّه  في  قراها *** فغدا  في  الوغى  يضيف  النسورا

والأصل  فيه  قول  أحد  شعراء  الحماسة  :

لمست  بكفّي  كفّه  أبتغي  الندى *** ولم  أدر  أنّ  الجود  من  كفّه  يُعدي

قال  الشريف  في  البرق  :

قمن  نساء  الحيِّ  يقتبسـ *** ـنه  ناراً  من  الإيماض  لم  تُضرمِ

أخذه  ابن  القيّم  المذكور  فقال  :

حسبنه  خلف  البيوت  ضرماً *** فرحن  وهناً  يقتبسن  ناره

وقال  الشريف  :

حتّى  رمى  الإ  صباح  في  ليلة *** لفّت  أزار  الرجل  المحرم

أخذه  القيّم  أيضاً  بقوله  :

وصار  بالصبح  كعبد  محرم *** راح  يشدُّ  بالصفا  أزراره

وقال  الشريف  :

والقول  يعرض  كالهلال  فإن  مشى *** فيه  الفعال  فذاك  بدر  تمام

أخذه  السيّد  حيدر  الحلّي  فقال  مادحاً  :

كنت  الهلال  فزدت  في *** مدحي  إلى  أن  صرت  بدرا

قال  الشريف  في  رثاء  والده  :

وغدت  عرانين  العلا  وأكفّها *** من  بين  أجدع  بعده  أو  أجذم

أخذه  السيّد  حيدر  في  رثاء  السيّد  مرزا  جعفر  :

شهرت  أيدي  المنايا  سيفها *** فاستعاذ  الدهر  منه  فزعا

وحمى  عن  أنفه  في  كفّه *** فإذا  الأقطع  يحمي  الأجدعا

كما  أخذه  عبد  المحسن  الكاظمي  في  رثاء  الشيخ  محمّد  حسن  آل ياسين  فقال  :

وغدت  أكفّ  المجد  إثر  أنوفها *** هذي  مجذّمة  وهذي  جدَّع  :

قال  الشريف  في  الخليفة  الطائع  :

لله  ثمّ  لك  المحلُّ  الأعظم *** وإليك  ينتسب  العلاء  الأقدم

أخذ  سبط  بن  التعاويذي  الشطر  الثاني  بتمامه  فقال  :

وإليك  ينتسب  العلاء  قديمه *** وحديثه  وطريفه  وتلاده

قال  الشريف  :

كالغيث  يخلفه  الربيع  وبعضهم *** كالنار  يخلفها  الرماد  المظلم

وقال  السيّد  حيدر  الحلّي  :

وبعضهم  كالنّار  لا  يخلفها *** فيها  سوى  ما  كان  من  رمادها

قال  الشريف  :

إنَّ  الجياد  على  المرا *** بط  تشتكي  طول  المقام

وقال  السيّد  حيدر  في  الشطر  الأوّل  من  هذا  البيت  :

الخيل  عندك  ملّتها  مرابطها *** والبيض  منها  عرا  أغمادها  السأم

قال  الشريف  :

إنّما  قصّر  في  آجالنا *** أنّنا  نأنف  من  موت  الهرم

وقال  السيّد  حيدر  الحلّي  :

عهدي  بهم  قصر  الأعمار  شأنهم *** لا  يهرمون  وللهيّابة  الهرم

الأمير  أبو  محمّد  عبد  الله  المعروف  بابن  سنان  الخفاجي  الحلبي المتوفّى  عام  (٤٦٦هـ)  كان  يحذو  حذو  الشريف  ويتبع  طريقته  ويأخذ  من معانيه  وألفاظه  :

قال  الشريف  :

لست  للزهراء  إن  لم  ترها *** كوعول  الهضب  يعجمن  اللجم

وقال  ابن  سنان  :

لست  من    عدنان  إن  لم  ترها *** كذئاب  القاع  يرعين  اللجم

قال  الشريف  :

دين  عليك  فإن  تقضيه  أحي  به *** وإن  أبيت  تقاضينا  إلى  حكم

وقال  ابن  سنان  :

فكيف  تقذف  ودّاً  كنت  تحفظه *** لقد  خصمتك  لو  صرنا  إلى  حكم

قال  الشريف  :

يا  قلب  ما  أنت  من  نجد  وساكنه *** خلّفت  نجداً  وراء  المدلج  الساري

نظر  إليه  ابن  سنان  بقوله  :

لقد  علقت  بشعب  غير  ملتئم *** آهاً  لقلبك  من  نجد  وساكنه

وقال  ابن  سنان  أيضاً  :

يا  إخوتي  وإذا  صدقت  فأنتم *** من  إخوة  الأيّام  لا  من  إخوتي

بعداً  لأيّامي  التي  علّقتها *** بكم  فحارت  في  السبيل  وضلّت

قال  الشريف  :

إن  الذوابل  والأقلام  أرشية *** إلى  العلا  لملوك  العرب  والعجم

ليس  السيوف  عن  الأقلام  غانية *** الفري  للسيف  والتقدير  للقلم

وقد  أجاد  في  أخذ  معناهما  السيّد  رضا  الهندي  الموسوي  فقال  في مطلع  قصيدة  مدح  بها  أحد  علماء  إيران  من  أقطاب  الحركة  الدستورية  :

السيف  من  حقّه  أن  يخدم  القلما *** يجري  مداداً  فيبكي  السيف  منه  دما

قال  الشريف  في  رثاء  شرف  الدولة  بن  عضد  الدولة  :

لم  يجر  يوماً  بأطراف  العراق  دماً *** إلاّ  وراع  دماء  القوم  في  الشام

نظر  إليه  الشيخ  حمادي  نوح  الحلّي  فقال  في  رثاء  العلاّمة  السيّد  مهدي القزويني  :

خبر  يدكدك  في  العراق  جباله *** فتراع  من  دهش  جبال  الشام

قال  الشريف  في  مدح  الطائع  العبّاسي  :

فإذا  غضبت  فأنت  أنت  شجاعة *** توفي  على  غضب  الردى  وهمُ  همُ

نظر  إليه  السيّد  حيدر  الحلّي  فقال  يخاطب  الإمام  المهدي(عليه السلام)  :

ما  خلت  تقعد  حتّى  تستثار  لهم *** وأنت  أنت  وهم  فيما  جنوه  هم

قال  الشريف  :

لا  يستقرّ  المال  فوق  أكفّهم *** كالسيل  يزلق  من  ذرى  الأعلام

أخذه  القاضي  الأرجاني  فقال  :

له  كفٌّ  يزلُّ  المال  منها *** وكيف  يقرُّ  ماء  في  مسيل

قال  الشريف  في  وصف  شعره  :

لا  يفضل  المعنى  على  لفظه *** شيئاً  ولا  اللفظ  على  المعنى

أخذه  السيّد  السعيد  الحبّوبي  في  وصف  شعره  وزاده  حسناً  :

فلست  ترى  به  لفظاً  غريباً *** ولا  معنى  به  إلاّ  غريبا

قال  الشريف  :

ومنظر  كان  في  السرّاء  يضحكني *** يا  قرب  ما  عاد  بالضرّاء  يبكيني

أخذه  ابن  زيدون  بقوله  من  قصيدته  الشهيرة  (٤٦٣هـ)  :

إنّ  الزمان  الذي  ما  زال  يضحكنا *** أنساً  بقربكم  قد  عاد  يبكينا

قال  الشريف  في  إحدى  غراميّاته  :

لو  أنَّ  قومك  نصَّلوا  أرماحهم *** بعيون  سربك  ما  اُبلَّ  طعينُ

وقد  ألمَّ  به  الشيخ  صالح  الكوّاز  في  إحدى  حسينيّاته  :

لو  كلّ  طعنة  فارس  بأكفهم *** لم  يخلق  المسبار  للمطعون

قال  الشريف  :

أشمّ  منك  نسيماً  لست  أعرفه *** كأنّ  ظمياء  جرَّت  فيك  أردانا

نظر  إليه  والدنا  الشيخ  يعقوب  بن  جعفر  بن  الحسين  فقال  :

وبمسك  ضاع  الصعيد  إذا *** انجرَّ  رداء  لها  عليه  ومرط

قال  الشريف  :

مررت  على  تلك  الديار  ووحشُها *** دوان  ومن  يحكين  غير  دوان

فأنكرت  العينان  والقلب  عارف *** قليلاً  ولحّا  بعدُ  بالهملان

وقال  الأبيوردي  الأموي  وأخذ  الصدر  الأوّل  من  البيت  الثاني  :

لها  في  محاني  ذلك  الشعب  منزل *** إذا  أنكرته  العين  فالقلب  عارف

قال  الشريف  في  رثاء  الصابي  :

ملأت  بمحياك  البلاد  مساعياً *** ويملأ  مثواك  البلاد  مناعيا

أخذه  السيّد  حيدر  الحلّي  في  رثاء  الشيخ  مهدي  آل  كاشف  الغطاء  :

ملأت  مكارمك  البسيطة  أنعماً *** فلذلك  انعقدت  لفقدك  مأتما

قال  الشريف  :

ومن  حذر  لا  أسأل  الركب  عنكم *** وأعلاق  قلبي  باقيات  كما  هيا

وقال  السيّد  السعيد  الحبّوبي  من  مقطوعة  يشكّ  في  صحّة  نسبتها  إليه  :

لقد  طال  عهد  الحبّ  بيني  وبينهم *** وأشجان  قلبي  باقيات  كما  هيا

قال  الشريف  :

وما  شبت  من  طول  السنين  وإنّما *** غبار  حروب  الدهر  غطّى  سواديا

أخذ  معناه  الشاعر  الشهير  محمّد  مهدي  الجواهري  بقوله  :

ومستنكر  شيباً  قبيل  أوانه *** أقول  له  هذا  غبار  الوقائع

قال  الشريف  :

هل  عرَّقت  فيكم  كفاطمة *** أمٌّ  وهل  كمحمد  جدُّ

أخذه  علاء  الدين  الشفهيني  الحلّي  من  قصيدة  له  حسينية  :

فما  كلُّ  جدّ  في  الرجال  محمّد *** ولا  كلُّ  أمّ  في  النساء  بتول

قال  الشريف  :

تمنّى  رجال  نيلها  وهي  شامس *** وأين  من  الشمس  الأكفّ  اللوامس

وقال  تاج  الدين  الحسن  بن  راشد  من  قصيدة  يمدح  فيها  الإمام المهدي(عليه السلام)  متضمناً  الشطر  الثاني  :

كشمس  تعالت  عن  أكفّ  لوامس *** (وأين  من  الشمس  الأكفُّ  اللوامس)

قال  الشريف  :

أنامله  في  الحرب  عشر  أسنّة *** ولكنّها  في  الجدب  عشر  غمائم

وأين  يقع  قول  الشيخ  حسن  مصبح  الحلّي  من  الشطر  الثاني  :

خصباً  بعشر  غمائم  لكنّها  الـ *** ـعشر  الأنامل  تستهلّ  وتغدق

قال  الشريف  في  مدح  الطائع  :

يُعدّ  لعليائه  هاشماً *** إذا  ما  الأذلاّء  عدُّوا  هشاما

إذا  ما  بنوا  بيت  أكرومة *** أطالوا  السماك  ومدُّوا  الدعاما

أخذه  الخطيب  الشيخ  حسّون  بن  عبد  الله  الحلّي  :

فهمُ  الوارثون  أكرومة  الـ *** ـمجد  قديماً  من  هاشم  لا  هشام

قال  الشريف  :

أمن  المروءة  أن  أبيت  مسهّداً *** قلقاً  أبلُّ  ملابسي  بدموعي

وتبيت  ريَّان  الجفون  من  الكرى *** وأبيت  من

مع  الشريف  الرضي  في  ديوانه – الثامن

قال  الشريف  مادحاً :

قام  يجني  العلا  وأنتم  قعود *** وصحا  للندى  وأنتم  سكارى

أخذه  سبط  بن  التعاويذي  ولم  يحسن  أخذه :

إذا  تيقّظت  للعلا  رقدوا  عنها *** وإن   قمت   بالندى   قعدوا

قال  الشريف :

أفي  كلِّ  يوم  أنت  ماتح  عبرة *** على  طلل  بالواد  أو  منزل  قفر

وقال  عبد  المحسن  الكاظمي  في  عينيّته  الشهيرة  وقد  أخذ  الشطر  الأوّل برمّته  :

أفي  كلِّ  دار  أنت  ماتح  عبرة *** إذا  غاض  منها  مدمع  فاض  مدمع

قال  الشريف  :

في  صيال  الأسود  إن  نزل  الخطـ *** ــب  عليهم  وفي  حياء  العذارى

أخذه  سبط  بن  التعاويذي  فقال  :

من  ليوث  الشرى  إذا  دارت  الـ *** ـحرب  وفي  السلم  من  ظباء  الخدور

قال  الشريف  :

الماء  في  ناظري  والنار  في  كبدي *** إن  شئت  فاغترفي  أو  شئت  فاقتبسي

أخذه  العلاّمة  محمّد  الحسين  كاشف  الغطاء  :

خذوا  الماء  عن  عينىّ  والنار  عن  قلبي *** ولا  تحملوا  للبرق  منّا  ولا  السحب

قال  الشريف  مادحاً :

كأنَّ  ملوك  الأرض  حول  سريره *** بغاثٌ  وقوفٌ  والقطاميُّ  جالس( )

أخذه  الشيخ  محمّد  السماوي  في  مدح  سيّدي  الوالد(رحمه الله)  من  أبيات  :

ترى  الأنام  سكوتاً  عند  منطقه *** كأنَّه  مضرحىّ  والورى  رخم( )

قال  الشريف  مخاطباً  بهاء  الدولة  :

لا  تعطش  الزهر  الذي  نبته *** بصوب  انعامك  قد  روّضا

وأرع  لغرس  أنت  أنهضته *** لولاك  ما  قارب  أن  ينهضا

نظر  إليهما  سبط  بن  التعاويذي  فقال  يخاطب  عضد  الدين  بن  المظفّر  :

وسَقّ  غروس  المكرمات  فإنّني *** أعيذك  أن  تذوي  وأنت  لها  ربُّ

وحاشى  لمدحي  أن  تجفّ  غصونه *** ومن  بحر  جدواك  المعين  لها  شرب

قال  الشريف  في  الرثاء  :

أرسى  النسيم  بواديكم  ولا  برحت *** حوامل  المزن  في  أجداثكم  تضع

ولا  يزال  جنين  النبت  ترضعه *** على  قبوركم  العرّاصة  اللمع

وقد  سرقه  ابن  سعد  الموصلي  سرقة  فاحشة  فقال  من  قصيدة  يتشوّق فيها  إلى  دمشق  مطلعها  :

سقى  دمشق  وأياماً  مضت  فيها *** مواطر  المزن  ساريها  وغاديها

ولا  يزال  جنين  النبت  ترضعه *** حوامل  المزن  في  أحشاء  أرضيها

قال  الشريف  في  رثاء  أبي  حسّان  أمير  عقيل  :

لقد  صغَّر  الأرزاء  رزؤك  عندها *** وهوَّن  عندي  النازل  المتوقعا

أخذه  ابن  الأعسم  النجفي  في  رثاء  أهل  البيت(عليه السلام)  :

أنست  رزيّتكم  رزايانا  التي *** سلفت  وهوَّنت  الرزايا  الآتية

قال  الشريف  :

تمضي  العلا  وإلى  ذراكم  ترجع *** شمس  تغيب  لكم  وأخرى  تطلع

نظر  إليه  الأخرس  البغدادي  فقال  في  آل  النقيب  :

ما  غاب  بدر  دجىً  منكم  ولا  غربا *** إلاّ  وأشرق  بدر  كان  محتجبا

قال  الشريف  :

هيهات  لا  تتكلّفنّ  لي  الهوى *** فضح  التطبّع  شيمة  المطبوع

أخذه  السيّد  علي  خان  في  قوله  من  قصيدة  أثبتها  في  سلافته  في ترجمة  الخطّي  :

أتجشم  السلوان  عنه  تكلُّفاً *** والطبع  يغلب  شيمة  المتطبِّع

كما  أخذه  شاعر  العرب  عبد  المحسن  الكاظمي  في  عينيّته  الشهيرة  :

تعسّفتم  ما  كان  منّي  شيمة *** وأين  من  المطبوع  من  يتطبّع

قال  الشريف  :

إذا  راق  صبح  فالحصان  مصاحب *** وإن  جنَّ  ليل  فالحسام  ضجيع

أخذه  السيّد  حيدر  الحلّي  في  رثاء  الإمام  الحسين(عليه السلام)  :

وله  الطرف  حيث  سار  أنيس *** وله  السيف  حيث  بات  ضجيع

قال  الشريف  :

كأنَّني  يوم  استعطي  نوالكم *** دان  من  الصخرة  الصمّاء  يغترف

أخذه  السيّد  حيدر  فقال  :

وفي  الناس  من  يغدو  به  مستميحه *** كمستقطر  ماء  من  الحجر  الصلد

قال  الشريف  :

وقيذين  قد  مال  النعاس  بهامهم *** كما  أرعشت  أيدي  المعاطين  قرقف( )

وقد  أخذه  الحاج  حسن  القيِّم  الحلّي  :

ميل  على  الأكوار  تحسـ *** ـبهم  تعاطوا  كأس  قرقف

قال  السيّد  الشريف  :

من  منصفي  من  الملول  المذاق *** إنّ  مودّات  القلوب  أرزاق

نظر  إليه  السيّد  حسين  الطباطبائي  المتوفّى  عام  (١٣٠٦هـ)  فقال  :

بودِّه  خصَّني  الله  الودود  بلى *** ما  الودُّ  بين  الورى  إلاّ  بأرزاق

قال  الشريف  :

مالوا  إليك  محبّة  فتجمّعوا *** ورأوا  عليك  مهابة  فتفرَّقوا

نظر  إليه  مهيار  بقوله  :

إذا  جلسوا  تجمّعت  المعالي *** وإن  ركبوا  تفرّقت  الجموع

قال  الشريف  :

إلاّ  الخلافة  ميّزتك  لأنّني *** أنا  عاطل  منها  وأنت  مطوّق

أخذه  منه  أبو  البدر  المظفّر  بن  محمّد  بن  معروف  كاتب  عميد  الملك من  شعراء  الدمية  (ص١١٨)  :

لا  غرو  أن  أعرى  وغيـ *** ري  في  ثياب  الوشي  رافل

إن  الحمائم  ذات  أطوا *** ق  وجيد  الباز  عاطل

قال  الشريف  :

يا  ظبية  البان  ترعى  في  خمائله *** ليهنك  اليوم  إنّ  القلب  مرعاك( )

الماء  عندك  مبذول  لشاربه *** وليس  يرويك  إلاّ  مدمع  الباكي

وقد  ألمّ  بمعناهما  السيّد  الشريف  الحبوبي  في  قصيدة  راسل  بها  الحاج محمّد  حسن  كبّة  :

يا  ريم  حسبك  مهجتي  مرعى *** لا  شيح  كاظمة  ولا  الجرعا

وكفاك  عن  ورد  تلمُّ  به *** عين  تفيض  غروبها  دفعا

قال  الشريف  :

سهم  أصاب  وراميه  بذي  سلم *** من  في  العراق  لقد  أبعدت  مرماك

وقال  مهيار  :

ورام  سهم  عينيه  بسلع *** وبالزوراء  يقتل  من  يريد

قال  السيّد  الشريف  :

هامت  بك  العين  لم  تتبع  سواك  هوى *** من  أعلم  العين  أنَّ  القلب  يهواك

وعدٌ  لعينيك  عندي  ما  وفيت  به *** ياقرب  ما  كذبت  عينىَّ  عيناك

وقد  تداول  المعنى  كثير  من  الشعراء  فقال  أحدهم  :

وألسننا  ممنوعة  عن  مرادنا *** وألحاظنا  عنا  تجيب  وتفهمُ

حواجبنا  تقضي  الحوائج  بيننا *** ونحن  سكوت  والهوى  يتكلّم

ونظر  إليه  شاعر  العراق  المعاصر  الشيخ  محمّد  رضا  الشبيبي  فقال  :

تفاهمتا  عيني  وعينك  لحظة *** وأدركتا  أنّ  القلوب  شواهدُ

ثمّ  جاء  شاعر  مصر  أحمد  شوقي  فقال  :

وتعطَّلت  لغة  الكلام  فخاطبت *** عينىَّ  في  لغة  الهوى  عيناك

قال  الشريف  :

إلى  البلد  الحرام  معرّضات *** لإجراء  الطلى  بدم  حلال

أخذ  المعنى  السيّد  إبراهيم  الطباطبائي  فقال  :

أقول  لها  اسفحي  بدم  حلال *** ضحى  يا  نوق  بالبلد  الحرام

قال  الشريف  يصف  الناقة  ووخدها  في  السير  :

كتبت  سطوراً  في  مناسمها *** فوق  الأباطح  والسُرى  يُملي

نظر  إليه  (صرَّدر)  فقال  في  الطلول  :

وقفنا  صفوفاً  في  الديار  كأنّها *** صحائف  ملقاة  ونحن  سطورها

وقال  الشريف  :

وموت  الفتى  خير  له  من  حياته *** إذا  جاور  الأيّام  وهو  ذليل

أخذه  أبو  المحاسن  الحاج  محمّد  حسن  الحائري  الكربلائي  فقال  :

إذا  ألف  الدنىُّ  حياة  ذلّ *** فموت  العزِّ  أولى  بالغيور

وقال  الشريف  في  رثاء  الصاحب  بن  عبّاد  :

مفتاح  كلِّ  ندى  وربَّ  معاشر *** كانوا  على  أموالهم  أقفالا

أخذه  من  الشعراء  المتأخّرين  الحاج  حسن  القيّم  الحلّي  من  قصيدة  :

يا  فاتحاً  باب  الندى *** إن  أغلق  الكرماء  بابه

وقال  الشريف  في  الطائع  :

وأعطيت  ما  لم  يُعط  في  الملك  مالك *** كأنّك  فضل  والأنام  فضول

نظر  إليه  السيّد  حيدر  الحلّي  :

وقل  لعوادي  الحتف  شأنك  والورى *** مضى  الفضل  والباقون  منها  فضولها

وقال  الشريف  في  رثاء  الصاحب  :

وأقم  على  يأس  فقد  ذهب  الذي *** كان  الأنام  على  يديه  عيالا

أخذه  السيّد  حسين  بن  السيّد  سليمان  الحلّي  المتوفّى  عام  (١٢٣٦هـ) المترجم  في  الـ  (ج٢)  من  كتابنا  البابليّات  في  رثاء  الشيخ  جعفر  كاشف  الغطاء المتوفّى  عام  (١٢٢٨هـ)  :

لقد  ذهب  الذي  كانت  لديه *** جميع  الناس  عاكفة  عيالا

هلاّ  أقالتك  الليالي  عثرة *** يا  من  إذا  عثر  الزمان  أقالا

وقد  أخذه  السيّد  حسين  المذكور  أيضاً  فقال  :

عثرت  ولم  يقلك  الدهر  يا  من *** إذا  عثر  الزمان  له  أقالا

وقال  الشريف  في  قصيدته  :

ما  كنت  أوّل  كوكب  ترك  الدنى *** وسما  إلى  نظرائه  فتعالى

أخذه  السيّد  حسين  أيضاً  فقال  :

سما  للعالم  العلوىِّ  لمّا *** رأى  نظراءه  فيه  تعالى

وقد  أخذه  قبله  من  الشريف  سبط  بن  التعاويذي  في  رثاء  جدّه  لأمّه  :

ما  غاب  في  الترب  ولكن  كوكب *** رقى  إلى  جوِّ  السماء  وصعد

قال  الشريف  في  إحدى  غراميّاته  :

أنل  نائلاً  أولا  تثنِّ  بنظرة *** فإنّي  بالأولى  الغداة  قتيلُ

أخذه  السيّد  جعفر  الحلّي  ولم  يحسن  أخذه  فقال  :

يا  قاتلي  باللحظ  أوّل  مرّة *** أجهز  بثانية  على  المقتول

قال  الشريف  في  الصاحب  :

هيهات  فاتهم  تراث  مخاطر *** حفظ  الثناء  وضيَّع  الأموالا

أخذ  المعنى  السيّد  مهدي  بن  داود  الحلّي  فقال  في  آل  كبّة  :

حرصت  على  حفظ  الثناء  وضيّعت *** ما  بين  طلاّب  الندى  أموالها

قال  الشريف  :

يعجبني  مطل  ديون  الهوى *** لطول  تردادي  على  الماطل

نظر  إليه  تلميذه  مهيار  فقال  :

يا  ماطلي  بالدين  ما  ساءني *** إليك  ترديد  المواعيد  لي

قال  الشريف  في  مطلع  إحدى  حسينيّاته  :

راحل  أنت  والليالي  نزول *** ومضرٌّ  بك  البقاء  الطويل

أخذه  الشاعر  الشهير  جميل  صدقي  الزهاوي  فقال  :

ساكن  أنت  والأعادي  تقول *** ومضرٌّ  بك  السكوت  الطويل

قال  الشريف  :

غاية  الناس  في  الزمان  فناء *** وكذا  غاية  الغصون  الذبول

وقال  الشيخ  عبد  الحسين  صادق  العاملي  في  رثاء  عليّ  بن  الحسين شهيد  الطفّ  :

بكر  الذبول  على  نضارة  غصنه *** إنّ  الذبول  لآفة  الغصن  الندي

قال  الشريف  في  مدح  الطائع  :

فاتني  منك  انتصار  بيميـ *** ـني  فتلافيت  انتصاراً  بمقالي

أخذه  مهيار  الديلمي  فقال  في  أهل  البيت (عليهم السلام)  :

فما  فاتني  نصركم  باللسا *** ن  إذا  فاتني  نصركم  باليد

وقد  أخذه  أيضاً  عبد  المحسن  الكاظمي  من  قصيدة  في  الحرب الطرابلسية  الإيطالية  فقال  :

إن  فاتني  نصر  فرسان  الوغى  بيدي *** فكم  أفاد  لسان  في  الوغى  وفمُ

قال  الشريف  متحمّساً  :

يستشعر  الطرف  زهواً  حين  أركبه *** كأنّه  بنجوم  الليل  منتعل

أخذه  سبط  بن  التعاويذي  يصف  فرس  الخليفة  :

مفتخراً  بنعله *** على  هلال  الأفقِ

قال  الشريف  :

طلبوا  التراث  فلم  يروا  من  بعده *** إلاّ  علاً  وفضائلاً  وجلالا

وهو  عين  ما  قاله  في  رثاء  والده  :

هل  يورث  الرجل  الكريم  إذا  مضى *** إلاّ  بواقي  من  علاً  وتكرُّمِ

أخذه  السيّد  حيدر  الحلّي  فقال  :

مناجيب  قد  أفنى  التراث  على  الندى *** أبوهم  وأبقى  في  العلا  لهم  الذكرى

قال  الشريف  :

وتُرى  خفافاً  في  الوغى  فإذا  انتدوا *** وتلاغط  النادي  رأيت  ثقالا

أخذه  السيّد  حيدر  فقال  :

إن  دُعوا  خفّوا  إلى  داعي  الوغى *** وإذا  النادي  احتبى  كانوا  الثقالا

قال  الشريف  في  كرائم  النبوّة  يوم  كربلاء  :

قد  سلبن  القناع  عن  كلِّ  وجه *** فيه  للصون  من  قناع  بديل

أخذه  الحاج  هاشم  الكعبي  بقوله  :

بدت  وهي  حسرى  الوجه  ممّا  يروعها *** وكم  حاسر  في  صونه  يتنقّب

قال  الشريف  :

وبات  بارق  ذاك  الثغر  يوضح  لي *** مواقع  اللثم  في  داج  من  الظلم

نظر  إليه  إبراهيم  الغزّي  المتوفّى  عام  (٥٢٤هـ)  فقال  من  قصيدة  :

حتّى  إذا  طاح  منها  المرط  من  دهش *** وأنحلَّ  بالضم ّ سلك العقد في الظلم

تبسّمت  فأضاء  الليل  فالتقطت *** حبّات  منتثر  في  ضوء  منتظم

ونظر  إليه  مهيار  قبله  فقال  :

وقد  كاد  أسداف  الدجى  أن  يضلّها *** فما  دلّها  إلاّ  وميض  ثناياها

وقال  الشريف  في  رثاء  ابن  ليلى  :

لعمرو  الطير  يوم  ثوى  ابن  ليلى *** لقد  عكفت  على  لحم  كريم

أخذه  السيّد  حيدر  الحلّي  في  رثاء  جدِّه  الحسين(عليه السلام)  إلاّ  أنّه  جعل السيوف  مكان  الطير  وقد  أجاد  بقوله  :

وإن  أكلت  هندية  البيض  شلوه *** فلحم  كريم  القوم  طعم  المهنّدِ

قال  الشريف  :

بن  على  الناس  بعزٍّ  وعلاً *** ستساويهم  غداً  بين  الرمم

أخذ  المعنى  مهيار  الديلمي  بقوله  :

ميّز  من  الناس  على  ظهرها *** نفسك  لا  ميزة  بين  الرغام

قال  الشريف  :

ماض  من  العيش  لو  يفدى  فديت  له *** كرائم  المال  من  خيل  ومن  نَعَمِ

أخذه  القاضي  الأرجاني  ولم  يوفّق  في  أخذه  :

لو  كان  يفدى  فيُرى  راجعاً *** ماض  من  العيش  فديناه

قال  الشريف  :

ولم  أر  مثل  الماطلات  عشية *** ذوات  يسار  ما  قضين  غريما

أخذ  مهيار  معنى  الشطر  الثاني  منه  وأودعه  الشطر  الأوّل  من  قوله  :

يالواة  الدين  عن  ميسرة *** والضنينات  وماكنَّ  لئاما

قال  الشريف  في  وصف  الإبل  التي  أنحلها  السير  :

هنَّ  القسىُّ  من  النحول  فإن  سما *** طلب  فهنَّ  من  النجاء  الأسهم

أخذه  ابن  قلاقس  بأكثر  ألفاظه  فقال  :

خوص  كأمثال  القسىِّ  نواحلاً *** فإذا  سما  طلب  فهنَّ  سهام

وأخذه  من  المتأخّرين  السيّد  جعفر  الحلّي  بقوله  :

متعطّفات  كالقسىِّ  موائلاً *** وإذا  ارتمت  فكأنّما  هي  أسهم

قال  الشريف  :

فلا  باسط  بالسوء  إن  ساءني  يداً *** ولا  فاغر  بالذمِّ  إن  رابني  فما

وقال  مهيار  :

ولا  تحسبنِّي  باسطاً  يد  دافع *** ولا  فاتحاً  من  بعدها  فم  عاتب

قال  الشريف  :

ولولاك  ما  استسقيت  مزناً  لمنزل *** فأحمل  فيه  منّة  للغمائم

وقد  أحسن  أخذه  ابن  الخيّاط  الدمشقي  وزاد  معناه  حسناً  على  الأصل  :

وما  كنت  لولا  أنَّ  دمعي  من  دم *** لأحمل  منّا  للسحاب  بسقياه

قال  الشريف  من  قصيدة  في  مدح  والده  :

وفتية  علّموا  القنا  كرماً *** فأصبحت  من  ضيوفها  الرخم

أخذه  الحاج  حسن  القيّم  الحلّي  في  رثاء  الحسين(عليه السلام)  :

أعدت  السيف  كفّه  في  قراها *** فغدا  في  الوغى  يضيف  النسورا

والأصل  فيه  قول  أحد  شعراء  الحماسة  :

لمست  بكفّي  كفّه  أبتغي  الندى *** ولم  أدر  أنّ  الجود  من  كفّه  يُعدي

قال  الشريف  في  البرق  :

قمن  نساء  الحيِّ  يقتبسـ *** ـنه  ناراً  من  الإيماض  لم  تُضرمِ

أخذه  ابن  القيّم  المذكور  فقال  :

حسبنه  خلف  البيوت  ضرماً *** فرحن  وهناً  يقتبسن  ناره

وقال  الشريف  :

حتّى  رمى  الإ  صباح  في  ليلة *** لفّت  أزار  الرجل  المحرم

أخذه  القيّم  أيضاً  بقوله  :

وصار  بالصبح  كعبد  محرم *** راح  يشدُّ  بالصفا  أزراره

وقال  الشريف  :

والقول  يعرض  كالهلال  فإن  مشى *** فيه  الفعال  فذاك  بدر  تمام

أخذه  السيّد  حيدر  الحلّي  فقال  مادحاً  :

كنت  الهلال  فزدت  في *** مدحي  إلى  أن  صرت  بدرا

قال  الشريف  في  رثاء  والده  :

وغدت  عرانين  العلا  وأكفّها *** من  بين  أجدع  بعده  أو  أجذم

أخذه  السيّد  حيدر  في  رثاء  السيّد  مرزا  جعفر  :

شهرت  أيدي  المنايا  سيفها *** فاستعاذ  الدهر  منه  فزعا

وحمى  عن  أنفه  في  كفّه *** فإذا  الأقطع  يحمي  الأجدعا

كما  أخذه  عبد  المحسن  الكاظمي  في  رثاء  الشيخ  محمّد  حسن  آل ياسين  فقال  :

وغدت  أكفّ  المجد  إثر  أنوفها *** هذي  مجذّمة  وهذي  جدَّع  :

قال  الشريف  في  الخليفة  الطائع  :

لله  ثمّ  لك  المحلُّ  الأعظم *** وإليك  ينتسب  العلاء  الأقدم

أخذ  سبط  بن  التعاويذي  الشطر  الثاني  بتمامه  فقال  :

وإليك  ينتسب  العلاء  قديمه *** وحديثه  وطريفه  وتلاده

قال  الشريف  :

كالغيث  يخلفه  الربيع  وبعضهم *** كالنار  يخلفها  الرماد  المظلم

وقال  السيّد  حيدر  الحلّي  :

وبعضهم  كالنّار  لا  يخلفها *** فيها  سوى  ما  كان  من  رمادها

قال  الشريف  :

إنَّ  الجياد  على  المرا *** بط  تشتكي  طول  المقام

وقال  السيّد  حيدر  في  الشطر  الأوّل  من  هذا  البيت  :

الخيل  عندك  ملّتها  مرابطها *** والبيض  منها  عرا  أغمادها  السأم

قال  الشريف  :

إنّما  قصّر  في  آجالنا *** أنّنا  نأنف  من  موت  الهرم

وقال  السيّد  حيدر  الحلّي  :

عهدي  بهم  قصر  الأعمار  شأنهم *** لا  يهرمون  وللهيّابة  الهرم

الأمير  أبو  محمّد  عبد  الله  المعروف  بابن  سنان  الخفاجي  الحلبي المتوفّى  عام  (٤٦٦هـ)  كان  يحذو  حذو  الشريف  ويتبع  طريقته  ويأخذ  من معانيه  وألفاظه  :

قال  الشريف  :

لست  للزهراء  إن  لم  ترها *** كوعول  الهضب  يعجمن  اللجم

وقال  ابن  سنان  :

لست  من    عدنان  إن  لم  ترها *** كذئاب  القاع  يرعين  اللجم

قال  الشريف  :

دين  عليك  فإن  تقضيه  أحي  به *** وإن  أبيت  تقاضينا  إلى  حكم

وقال  ابن  سنان  :

فكيف  تقذف  ودّاً  كنت  تحفظه *** لقد  خصمتك  لو  صرنا  إلى  حكم

قال  الشريف  :

يا  قلب  ما  أنت  من  نجد  وساكنه *** خلّفت  نجداً  وراء  المدلج  الساري

نظر  إليه  ابن  سنان  بقوله  :

لقد  علقت  بشعب  غير  ملتئم *** آهاً  لقلبك  من  نجد  وساكنه

وقال  ابن  سنان  أيضاً  :

يا  إخوتي  وإذا  صدقت  فأنتم *** من  إخوة  الأيّام  لا  من  إخوتي

بعداً  لأيّامي  التي  علّقتها *** بكم  فحارت  في  السبيل  وضلّت

قال  الشريف  :

إن  الذوابل  والأقلام  أرشية *** إلى  العلا  لملوك  العرب  والعجم

ليس  السيوف  عن  الأقلام  غانية *** الفري  للسيف  والتقدير  للقلم

وقد  أجاد  في  أخذ  معناهما  السيّد  رضا  الهندي  الموسوي  فقال  في مطلع  قصيدة  مدح  بها  أحد  علماء  إيران  من  أقطاب  الحركة  الدستورية  :

السيف  من  حقّه  أن  يخدم  القلما *** يجري  مداداً  فيبكي  السيف  منه  دما

قال  الشريف  في  رثاء  شرف  الدولة  بن  عضد  الدولة  :

لم  يجر  يوماً  بأطراف  العراق  دماً *** إلاّ  وراع  دماء  القوم  في  الشام

نظر  إليه  الشيخ  حمادي  نوح  الحلّي  فقال  في  رثاء  العلاّمة  السيّد  مهدي القزويني  :

خبر  يدكدك  في  العراق  جباله *** فتراع  من  دهش  جبال  الشام

قال  الشريف  في  مدح  الطائع  العبّاسي  :

فإذا  غضبت  فأنت  أنت  شجاعة *** توفي  على  غضب  الردى  وهمُ  همُ

نظر  إليه  السيّد  حيدر  الحلّي  فقال  يخاطب  الإمام  المهدي(عليه السلام)  :

ما  خلت  تقعد  حتّى  تستثار  لهم *** وأنت  أنت  وهم  فيما  جنوه  هم

قال  الشريف  :

لا  يستقرّ  المال  فوق  أكفّهم *** كالسيل  يزلق  من  ذرى  الأعلام

أخذه  القاضي  الأرجاني  فقال  :

له  كفٌّ  يزلُّ  المال  منها *** وكيف  يقرُّ  ماء  في  مسيل

قال  الشريف  في  وصف  شعره  :

لا  يفضل  المعنى  على  لفظه *** شيئاً  ولا  اللفظ  على  المعنى

أخذه  السيّد  السعيد  الحبّوبي  في  وصف  شعره  وزاده  حسناً  :

فلست  ترى  به  لفظاً  غريباً *** ولا  معنى  به  إلاّ  غريبا

قال  الشريف  :

ومنظر  كان  في  السرّاء  يضحكني *** يا  قرب  ما  عاد  بالضرّاء  يبكيني

أخذه  ابن  زيدون  بقوله  من  قصيدته  الشهيرة  (٤٦٣هـ)  :

إنّ  الزمان  الذي  ما  زال  يضحكنا *** أنساً  بقربكم  قد  عاد  يبكينا

قال  الشريف  في  إحدى  غراميّاته  :

لو  أنَّ  قومك  نصَّلوا  أرماحهم *** بعيون  سربك  ما  اُبلَّ  طعينُ

وقد  ألمَّ  به  الشيخ  صالح  الكوّاز  في  إحدى  حسينيّاته  :

لو  كلّ  طعنة  فارس  بأكفهم *** لم  يخلق  المسبار  للمطعون

قال  الشريف  :

أشمّ  منك  نسيماً  لست  أعرفه *** كأنّ  ظمياء  جرَّت  فيك  أردانا

نظر  إليه  والدنا  الشيخ  يعقوب  بن  جعفر  بن  الحسين  فقال  :

وبمسك  ضاع  الصعيد  إذا *** انجرَّ  رداء  لها  عليه  ومرط

قال  الشريف  :

مررت  على  تلك  الديار  ووحشُها *** دوان  ومن  يحكين  غير  دوان

فأنكرت  العينان  والقلب  عارف *** قليلاً  ولحّا  بعدُ  بالهملان

وقال  الأبيوردي  الأموي  وأخذ  الصدر  الأوّل  من  البيت  الثاني  :

لها  في  محاني  ذلك  الشعب  منزل *** إذا  أنكرته  العين  فالقلب  عارف

قال  الشريف  في  رثاء  الصابي  :

ملأت  بمحياك  البلاد  مساعياً *** ويملأ  مثواك  البلاد  مناعيا

أخذه  السيّد  حيدر  الحلّي  في  رثاء  الشيخ  مهدي  آل  كاشف  الغطاء  :

ملأت  مكارمك  البسيطة  أنعماً *** فلذلك  انعقدت  لفقدك  مأتما

قال  الشريف  :

ومن  حذر  لا  أسأل  الركب  عنكم *** وأعلاق  قلبي  باقيات  كما  هيا

وقال  السيّد  السعيد  الحبّوبي  من  مقطوعة  يشكّ  في  صحّة  نسبتها  إليه  :

لقد  طال  عهد  الحبّ  بيني  وبينهم *** وأشجان  قلبي  باقيات  كما  هيا

قال  الشريف  :

وما  شبت  من  طول  السنين  وإنّما *** غبار  حروب  الدهر  غطّى  سواديا

أخذ  معناه  الشاعر  الشهير  محمّد  مهدي  الجواهري  بقوله  :

ومستنكر  شيباً  قبيل  أوانه *** أقول  له  هذا  غبار  الوقائع

قال  الشريف  :

هل  عرَّقت  فيكم  كفاطمة *** أمٌّ  وهل  كمحمد  جدُّ

أخذه  علاء  الدين  الشفهيني  الحلّي  من  قصيدة  له  حسينية  :

فما  كلُّ  جدّ  في  الرجال  محمّد *** ولا  كلُّ  أمّ  في  النساء  بتول

قال  الشريف  :

تمنّى  رجال  نيلها  وهي  شامس *** وأين  من  الشمس  الأكفّ  اللوامس

وقال  تاج  الدين  الحسن  بن  راشد  من  قصيدة  يمدح  فيها  الإمام المهدي(عليه السلام)  متضمناً  الشطر  الثاني  :

كشمس  تعالت  عن  أكفّ  لوامس *** (وأين  من  الشمس  الأكفُّ  اللوامس)

قال  الشريف  :

أنامله  في  الحرب  عشر  أسنّة *** ولكنّها  في  الجدب  عشر  غمائم

وأين  يقع  قول  الشيخ  حسن  مصبح  الحلّي  من  الشطر  الثاني  :

خصباً  بعشر  غمائم  لكنّها  الـ *** ـعشر  الأنامل  تستهلّ  وتغدق

قال  الشريف  في  مدح  الطائع  :

يُعدّ  لعليائه  هاشماً *** إذا  ما  الأذلاّء  عدُّوا  هشاما

إذا  ما  بنوا  بيت  أكرومة *** أطالوا  السماك  ومدُّوا  الدعاما

أخذه  الخطيب  الشيخ  حسّون  بن  عبد  الله  الحلّي  :

فهمُ  الوارثون  أكرومة  الـ *** ـمجد  قديماً  من  هاشم  لا  هشام

قال  الشريف  :

أمن  المروءة  أن  أبيت  مسهّداً *** قلقاً  أبلُّ  ملابسي  بدموعي

وتبيت  ريَّان  الجفون  من  الكرى *** وأبيت  منك  بليلة  الملسوع

أخذه  منه  السيّد  حسين  الطباطبائي  بحر  العلوم  :

أسرَّك  طرفي  أن  يبيت  مسهّداً *** وقلبي  ملسوع  وطرفك  راقد

انتهى .

****************************